वोट से विष तक : नागों का लोकतांत्रिक सफर

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 29, 2025 व्यंग रचनाएं 6

यह रचना नाग पंचमी के बहाने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। इसमें नाग रूपी नेताओं की तुलना असली साँपों से करते हुए बताया गया है कि किस तरह जनता अपने वोट, टैक्स और परंपरा से इन नागों को दूध पिलाने का काम करती है, जो बाद में उसे ही डसते हैं। यह व्यंग्य परंपरा, राजनीति और नकली महानताओं का आइना है।

‘डिजिटल इंडिया’ से ‘डिजिटल असमानता’ तक : क्या सबको मिल रहा है बराबरी का लाभ?

Dr Shailesh Shukla Jul 29, 2025 समसामयिकी 1

डिजिटल इंडिया के दस वर्षों बाद, आज़ादी और समानता का वादा अधूरा प्रतीत होता है। ग्रामीण भारत अब भी डिजिटल संसाधनों की कमी, तकनीकी अक्षमता और भाषा बाधाओं से जूझ रहा है। सरकारी ऐप्स और योजनाएं केवल कागज़ों में प्रभावी हैं, ज़मीनी स्तर पर आमजन तकनीकी अंधेरे में हैं। क्या यह समावेशी सशक्तिकरण है या डिजिटल बहिष्करण?

साथ देना तू मेरा-शिव भजन

Vidya Dubey Jul 28, 2025 भजन -रचनाएँ 2

यह कविता एक भक्त की भोलेनाथ से की गई विनम्र प्रार्थना है। जब संसार ठुकरा देता है, तब शिव ही सहारा बनते हैं। हर श्लोक में समर्पण, भक्ति और विश्वास की गूंज है—सच्चे ईश्वर से जुड़ने की एक सरल पर सशक्त पुकार।

चाँद हो या..कविता रचना

Sanjaya Jain Jul 27, 2025 हिंदी कविता 3

इस कविता में एक रात का भावचित्र है — जहाँ चाँद नहीं निकला, फिर भी कोई और "चाँद सा" मौजूद है जो सबका ध्यान खींच रहा है। उसकी अदाएँ, शर्मीलापन, सौंदर्य और भावनाओं की सजीवता से पूरी महफिल रोशन है। वह निराशा के अंधेरे में भी एक दीपक सा जगमगा रहा है — शान-ए-महफिल बनकर।

हम, हमारा बचपन और सरकारी स्कूल

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 27, 2025 व्यंग रचनाएं 9

सरकारी स्कूल की ये कहानी सिर्फ दीवारों के गिरने की नहीं, एक पूरी पीढ़ी के सपनों की टूट-फूट की दास्तान है। मिट्टी भरे मैदानों, पाटोरनुमा छतों और सामुदायिक भवनों में पढ़ते बच्चों की यादें आज भी ज़िंदा हैं। ये व्यंग्य नहीं, शिक्षा व्यवस्था पर एक करुण लेकिन तीखा कटाक्ष है — जहाँ स्कूल बारातगृह बनते हैं और छुट्टी पंचमेल की थाली से तय होती है।

“कारगिल विजय दिवस 2025 – नई पीढ़ी के लिए शौर्यगाथा का संदेश”

Poonam Chaturvedi Jul 26, 2025 Important days 0

"अगर आप चाहें, तो इतिहास रच सकते हैं; लेकिन अगर आप चाहें कि पीढ़ियाँ उसे याद रखें, तो उसे अपने लहू से लिखना होगा।" कारगिल केवल युद्ध नहीं, चेतना का पुनर्जागरण था। कारगिल विजय दिवस — स्मरण से आगे, राष्ट्रधर्म का अभ्यास।

सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला है —व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 26, 2025 Blogs 7

एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?

मैं झूठ की तलाश में हूँ-कविता रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 25, 2025 हिंदी कविता 4

यह कविता एक खोज है उस झूठ की, जिसे हमने सच मान लिया—जिसे प्रार्थनाओं, राष्ट्रगान, टीवी बहसों और भावनाओं में पवित्रता की तरह सजाया गया। यह झूठ अब विश्वास से अधिक विश्वसनीय हो गया है, और सत्य को दरकिनार कर चुका है।

“उपराष्ट्रपति का इस्तीफ़ा – लोकतंत्र की चुप्पी में एक तेज़ दस्तक” 

Poonam Chaturvedi Jul 24, 2025 समसामयिकी 0

उपराष्ट्रपति का इस्तीफा सिर्फ एक पद त्याग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन में आए गहरे असंतोष का संकेत है। यह घटना नीतिगत असहमति, राजनीतिक पुनर्संरेखण या वैचारिक टकराव का प्रतिनिधित्व कर सकती है। ऐसे समय में संविधान, संसद और जनविश्वास की स्थिरता का मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। यह इस्तीफा लोकतंत्र की जड़ों को झकझोरने वाली घटना बन जाता है।

जल संकट : टिकाऊ प्रबंधन की अनिवार्यता

Dr Shailesh Shukla Jul 24, 2025 समसामयिकी 1

भारत में जल संकट गहराता जा रहा है। 18% जनसंख्या के बावजूद भारत के पास मात्र 4% जल संसाधन हैं। जलवायु परिवर्तन, अति-दोहन और नीतिगत असफलताओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। दिल्ली, बेंगलुरु जैसे शहर "डे ज़ीरो" झेल चुके हैं। प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता चिंताजनक स्तर तक घट चुकी है। अब यह केवल पर्यावरण नहीं, एक सामाजिक-राजनीतिक संकट बन चुका है।