World Photography Day – A Nostalgic Reflection

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 19, 2025 Fashion,Food and Traveling 0

On World Photography Day, I look back at my 12-year journey—from a compact birthday gift camera to chasing birds at Ranthambhore and Ghana. Those days of patience, setups, and waiting for the perfect shot feel magical now, in contrast to today’s AI blur where real and generated frames look alike.

“Pin the Saree, Please” – A Satirical Tale

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 19, 2025 English-Write Ups 0

In our home, “Can you pin my saree?” is not just a request—it’s the official ceasefire declaration after a husband-wife war. Pinning sarees for 26 years has been my marital duty, peace treaty, and constitutional right. Without it, even Swiggy feels like punishment!

The Tragic Tale of a Desire-Humour-Satire

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 18, 2025 English-Write Ups 2

"For ten days, I’ve been suffocating in the minister’s trash bin, buried under countless petitions. I was born as a ‘desire,’ a letter of hope, but discarded like poison. You thought an MLA’s note could break walls without grease? Fools! In this democracy, glossy bribes live, while plain words die. My last wish—recycling, a samosa plate, or even a child’s paper boat. But here I rot, a symbol of your forgotten vote."

“आज़ादी के दिन का अधूरा सपना”-लघु कथा

Wasim Alam Aug 16, 2025 लघु कथा 4

"15 अगस्त के उत्सव में झंडे लहरा रहे थे, गीत बज रहे थे, लेकिन गांधी मैदान के किनारे नंगे पाँव बच्चे लकड़ी समेट रहे थे। उनके चेहरों पर डर और भूख लिखी थी। असली आज़ादी तब होगी जब बच्चे छत के लिए लकड़ी नहीं, सपनों के लिए कलम तलाशेंगे।"

आवारा कुत्तों का लोकतंत्र-व्यंग्य रचना

Vivek Ranjan Shreevastav Aug 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

"शहर की गलियों में लोकतंत्र आवारा कुत्ते के रूप में बैठा है। अदालत आदेश देती है, नगर निगम ठेका निकालता है, मोहल्ला समिति बहस करती है और सोशल मीडिया पर नारे गूँजते हैं। असल समस्या कचरे, नसबंदी और जिम्मेदारी की है—पर हम शॉर्टकट और कॉन्ट्रैक्ट में उलझे रहते हैं।"

माखन लीला-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 16, 2025 Important days 0

कृष्ण की माखन लीला आज लोकतंत्र में रूप बदल चुकी है। जहाँ कान्हा चोरी से माखन खाते थे, वहीं आज सत्ता और समाज में सब खुलेआम माखन खा-खिला रहे हैं। माखन खाने वाले मलाईदार दिखते हैं, खिलाने वाले जनता है। कोई माखन लगाकर प्रमोशन पा रहा है, तो कोई मिलावटी माखन से चमक रहा है। लोकतंत्र के चारों स्तंभ भी इसी माखन पर टिके हैं।

एक चिट्ठी भारत माँ के नाम

Neha Jain Aug 14, 2025 Blogs 2

भारत माँ को लिखी बेटी की भावनात्मक चिट्ठी, जिसमें अतीत के गौरवशाली भारत और वर्तमान की विडंबनाओं का तुलनात्मक चित्रण है। वीरता, सांस्कृतिक सौहार्द और नैतिक मूल्यों से लेकर आज के स्वार्थ, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन तक की यात्रा का मार्मिक बयान।

साठा सो पाठा-व्यंग्य रचना

Vivek Ranjan Shreevastav Aug 14, 2025 व्यंग रचनाएं 2

साठ के बाद ‘रिटायर’ नहीं, ‘री-फायर’ होना चाहिए—ये दुनिया के पुतिन, मोदी, ट्रंप, नेतन्याहू और खोमनेई साबित कर चुके हैं। अनुभव, जिद और आदतों का टिफिन बॉक्स लेकर बुजुर्ग दुनिया की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी अपना नमक-मिर्च मिला सकते हैं। उम्र बस कैलेंडर का पन्ना है।

एआई का झोला-छाप क्लिनिक

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 14, 2025 व्यंग रचनाएं 2

तकनीक के झोला-छाप अवतार में ChatGPT ने मरीज की देसी बोली का ऐसा शब्दशः अर्थ निकाला कि इलाज से ज़्यादा हंसी आ गई। नमक बदलने से लेकर पेट में “जलेबी” घूमने तक, एआई की नीम-हकीमी साबित करती है—दवा से ज़्यादा मज़ाक भी बिकता है।

आदमी और कुत्ते की आवारगी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 13, 2025 व्यंग रचनाएं 2

ह व्यंग्य इंसान और कुत्ते की आवारगी के बीच की महीन रेखा को तोड़ता है। अदालत के आदेश से कुत्तों को शेल्टर में डालने का फरमान आता है, मगर असली आवारगी तो इंसान में है—जो पूँछ हालात के हिसाब से सीधी या टेढ़ी कर लेता है। राजनीति, वोट बैंक और सोशल मीडिया के भौंकने तक, यह रचना समाज के कुत्तापन को आईना दिखाती है।