Vidya Dubey
Aug 26, 2025
Poems
2
जीवन की कठिनाइयाँ कभी धूप की तपिश, कभी आँधियों की मार, तो कभी अपनों की बेरुख़ी के रूप में सामने आती हैं। हारना आसान है, पर टिकना निखार देता है। गिरकर उठना, अंधड़ में दीप जलाना और लहरों से जूझकर पार होना ही असली जीवन दर्शन है।
Ram Kumar Joshi
Aug 26, 2025
हिंदी कविता
6
डॉ. राम कुमार जोशी की कविता डूबने की फिलॉसफी जीवन के गहन व्यंग्य को सरल शब्दों में उभारती है। जीवित व्यक्ति काम-क्रोध-अभिमान के भार से डूबता जाता है, जबकि मृत देह जल पर तैर जाती है। संदेश यही है—पाप और मोह की गठरियाँ जीवन को भारी बनाती हैं।
Ram Kumar Joshi
Aug 25, 2025
व्यंग रचनाएं
0
चाय, दाल और बीबी—तीनों का स्वभाव है उबलना और देर तक उबलना। ठीक से न उबले तो न स्वाद, न खुशबू और न कड़कपन। चाय सुबह ताज़गी देती है, दाल दिन सुधारती है और बीबी जीवन सँवारती है। सही उबालिए, रंग चोखा लाइए, वरना स्वाद बिगड़ जाएगा।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 25, 2025
व्यंग रचनाएं
0
"आ गए मेरी शादी का तमाशा देखने! नाना पाटेकर की झुंझलाहट, दूल्हे का डर और रिश्तेदारों की हंसी—पूरा दृश्य किसी फिल्मी फाँसी के सीन जैसा है। उधार का सूट, किराए की मुस्कान और भारी लिफाफों के बीच दूल्हा खुद को हलाल होने वाले बकरे सा महसूस कर रहा है। भीड़ के लिए यह रिसेप्शन नहीं, तमाशा है—और दूल्हे के लिए, ज़िंदगी की सबसे बड़ी सज़ा।"
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 23, 2025
व्यंग रचनाएं
5
“मैं और मेरा मोटापा – एक प्रेमकथा” में तोंद और इंसान का रिश्ता मोहब्बत जैसा दिखाया गया है। पड़ोसी शर्मा जी की खीझ, रिश्तेदारों की चेतावनी, सरकार की घोषणाएँ—सब बेअसर! मोटापा हर वक्त साथ है, जैसे जीवन-संगिनी। चेतावनी बोर्ड उखाड़कर समोसे खाने की जिद और गोल फिगर को भी गौरव मानना—यह व्यंग्य सिर्फ़ शरीर नहीं, पूरे समाज की मानसिकता पर कटाक्ष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 22, 2025
Book Review
1
The well-known humorist, blogger, and satirist Dr. Ankit Sharma—who is not just a “doctor by name” but also by profession—recently read my book Roses and Thorns. This review is shared exactly as I received it. And playfully, if you still feel my book (₹190) isn’t worth it, recover your money directly from him! 😀
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 22, 2025
व्यंग रचनाएं
3
भागम-भाग की ज़िंदगी का असली गणित है—भाग को भाग दो, और उत्तर आएगा ‘आराम’। खाट पर लेटना, कम्बल में दुनिया की फिक्र लपेटना ही असली दर्शन है। काम दुखों की जड़ है, पर आराम में पहले से ही राम बसे हैं। खरगोश दौड़ता है, कछुआ जीतता है, क्योंकि वो आराम से चलता है। तो मेरी मानो—खाट बिछाओ, पैर फैलाओ और कलयुग के मोक्ष ‘आराम’ का आनंद लो।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 21, 2025
English-Write Ups
0
The hunger for awards has turned into a literary disease—treated at roadside “Purushkaar stalls” like quack clinics. A writer without an award looks impotent; with one, even neighbors doubt it’s genuine: “So, where did you pull this off from?” The real nightmare begins with the Thank You Speech—who to mention, who to skip? This, indeed, is the philosophy of Award-ism.
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 21, 2025
व्यंग रचनाएं
0
सरकारी दफ़्तरों की असलियत पर यह व्यंग्य कटाक्ष करता है—जहाँ अफ़सर तनख़्वाह तो छुट्टियों की लेते हैं, पर काम के नाम पर बहानेबाज़ी ही उनका असली हुनर है। दफ़्तर का बोर्ड "साहब अवकाश पर हैं" एक स्थायी सच बन चुका है। अवकाश-प्रेम की यह आदत अब दफ़्तर की गलियों में लोककथा बन गई है, जहाँ छुट्टियाँ ही मोक्ष हैं और काम केवल ‘सुविधा शुल्क’ से जुड़ा हुआ कर्म।
Prahalad Shrimali
Aug 20, 2025
व्यंग रचनाएं
0
राजनीति के बम बड़े ही विचित्र होते हैं। असली बम बेचारे जबरन फोड़े जाते हैं, लेकिन राजनीति के बम तो खुद फटने को मचलते हैं। फूटते ही इनके जन्मदाता के मन में खुशी के लड्डू फूट पड़ते हैं। जनता को भी इन धमाकों से अजीबो-गरीब मनोरंजन मिलता है।