अरावली पर्वतमाला: अन्तरात्मा है, इन्हें मीटरों में मत नापो
अरावली पर्वतमाला को केवल मीटरों में मापना, उसकी अन्तरात्मा को अनदेखा करना है। यह पहाड़ नहीं, जल, जीवन और जलवायु की जीवित अवसंरचना है।
India Ki Baat
अरावली पर्वतमाला को केवल मीटरों में मापना, उसकी अन्तरात्मा को अनदेखा करना है। यह पहाड़ नहीं, जल, जीवन और जलवायु की जीवित अवसंरचना है।
अरावली की अहमियत उसकी ऊँचाई में नहीं, उसके काम में है। सवाल यह नहीं कि पहाड़ी कितनी ऊँची है, सवाल यह है कि वह हमें क्या बचा रही है।अरावली को लेकर बहस दरअसल विकास और संरक्षण के बीच उस संतुलन की तलाश है, जो अक्सर नीति में खो जाता है और प्रकृति में दिखाई देता है।
समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है। यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है। जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है। डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है। यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।
ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं। वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की। जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है। शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।
जब साहित्य अकादमी में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बिना प्रेस और बिना कॉन्फ़्रेंस के खत्म हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति बोल रही है—और व्यंग्य चुप नहीं रह सकता।
शिक्षक अब अ, आ, इ के साथ-साथ भौं-भौं व्याकरण में भी दक्ष हो रहे हैं।” “लोकतंत्र में अब सिर्फ़ इंसान नहीं, कुत्ते भी सर्वे-योग्य नागरिक हो चुके हैं।” “देश का भविष्य अब कक्षा में नहीं, गली-मोहल्लों में कुत्तों की गिनती में खोजा जा रहा है।” “सरकार की नज़र में संख्याबल सर्वोपरि है—चाहे वह इंसान का हो या कुत्ते का।”
भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।
अब बच्चा भगवान की देन नहीं, माता-पिता की पसंद बनता जा रहा है। आँखों का रंग, करियर, आईक्यू—सब कुछ पैकेज में मिलेगा। पर सवाल यह है कि डिज़ाइन में मासूमियत का कॉलम क्यों छूट गया?
धुरंधर उस दौर की फिल्म है जहाँ सिनेमा से ज़्यादा उसकी चर्चा तेज़ है। हाइप, राष्ट्रवाद, हिंसा और स्टारडम के बीच फँसी यह फिल्म दर्शक से सवाल भी करती है और उसे थकाती भी है। एक छोटे शहर के दर्शक की नज़र से पढ़िए—धुरंधर का ईमानदार, हल्का व्यंग्यात्मक और संतुलित रिव्यू।