डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 14, 2026
शोध लेख
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इलियड और महाभारत केवल युद्ध की कथाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों का महाकाव्य हैं।
जहाँ अखिलीस का क्रोध कथा को गति देता है, वहीं महाभारत में धर्म और अधर्म का द्वंद्व पूरी सभ्यता को झकझोर देता है।
दो अलग भूगोल, दो अलग संस्कृतियाँ—पर प्रश्न वही: युद्ध के बाद मनुष्य क्या बनता है?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 14, 2026
व्यंग रचनाएं
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मरना तय था, यह हम मान चुके थे—
पर किस तत्व से मरना है, यह विकल्प भी अस्पताल तय करेगा,
यह हमें बताया नहीं गया।
पहले आग, अब पानी…
लगता है अस्पताल पंचतत्व को
सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है।
Priyanka Ghumara
Jan 12, 2026
Culture
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“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।”
“लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।”
“लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।”
“परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 12, 2026
News and Events
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Lions Club Sarthak celebrated New Year, Lohri and Makar Sankranti with families, games, cultural bonding, and a meaningful financial literacy session.
Ram Kumar Joshi
Jan 11, 2026
हिंदी कविता
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“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।”
“तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।”
“राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।”
“अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
व्यंग रचनाएं
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दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी।
एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन—
न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
समसामयिकी
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“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।”
“जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।”
“हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।”
“इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
Poems
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यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर
दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है—
क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है
या रोज़ की साँस?
Prahalad Shrimali
Jan 9, 2026
हिंदी कविता
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कभी कच्चा केला, कभी पका आम—
बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में
हर रिश्ता, हर मूल्य
अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 9, 2026
व्यंग रचनाएं
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मेरा बाप घर में मर गया,
पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है।
बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं—
यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।