अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश – एक गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 3, 2025 Blogs 2

अधूरी देह में भी पूरा आकाश बसता है—यह कविता जीवन की बाधाओं में छिपी अनंत संभावनाओं और साहस के उजाले को आवाज़ देती है।जब दुनिया सीमाएँ गिनाती है, तब हम अपने भीतर की उड़ान खोजते हैं। यह गीत प्रतिकूलताओं के बीच जिजीविषा का घोष है।

समोसा: भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रथम त्रिकोणीय विश्वविद्यालय

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 3, 2025 व्यंग रचनाएं 0

कला का ब्रह्मांड जहाँ खत्म होता है, समोसा वहीं से अपना दर्शन शुरू करता है—तीन कोनों में आत्मा, पदार्थ और ऊर्जा समाहित।” “यूरी मायस्को ने शायद संगमरमर देखने से पहले भारतीय कैंटीन का समोसा खाया होगा—नहीं तो ‘ट्रिनिटी’ इतनी भूख-भरी क्यों बनती?” “संगमरमर की मूर्ति प्रकाश पकड़ती है, और समोसा हमारे दिल… और पेट।” “अगर इस देश की असल त्रिमूर्ति कोई है, तो वह तेल, आलू और मैदा है—बाकी सब कलात्मक विस्तार हैं।”

जॉली LLB 3 — एक छोटे शहर के दर्शक की ईमानदार दास्तान

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 2, 2025 Cinema Review 0

“छोटे शहर के दर्शक की नजर से देखा जाए तो ‘जॉली LLB 3’ सिर्फ एक कोर्टरूम फिल्म नहीं—बल्कि कानून, संवेदना और किसान के संघर्ष का वह संगम है जो OTT की स्क्रीन को भी असली सिनेमा की गर्मी दे देता है।”

हँसी के बाद उतरती चुप्पी: व्यंग्य का असली तापमान

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 2, 2025 आलोचना ,समीक्षा 0

“व्यंग्य हँसाने की कला नहीं, हँसी के भीतर छुपी बेचैनी को जगाने की कला है। वह पल जब मुस्कान के बाद एक सेकंड की चुप्पी उतरती है—वही असली व्यंग्य है।” “व्यंग्यकार हर दृश्य को तिरछी आँख से देखता है—क्योंकि सीधी आँख से देखने पर आजकल सब कुछ सामान्य लगने लगा है, और यही सबसे असामान्य बात है।”

गीता जयंती : कुरुक्षेत्र की धूल से उठती आत्मा की पुकार

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 1, 2025 Culture 0

आज गीता जयंती है—वह दिन जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जन्मा कृष्ण का अमर संदेश मानवता को मार्ग दिखाता है। भय, दुविधा और मोह से जूझते अर्जुन को मिला यह उपदेश आज भी हर मनुष्य के भीतर के संघर्ष को दिशा देता है। गीता केवल ग्रंथ नहीं, जीवन का शाश्वत प्रकाश है।”

सुसरी माया का भटकाव-हास्य व्यंग्य रचना

Ram Kumar Joshi Dec 1, 2025 व्यंग रचनाएं 4

“डा. रामकुमार जोशी की यह व्यंग्यात्मक आत्मकथा सड़कों की भीड़ से ज्यादा वैवाहिक भीड़भाड़ की कहानी कहती है। सड़क पर दिखी ‘अज्ञात मोहतरमा’ ने एक क्षण को ड्राइविंग भी भुला दी और विवेक भी। पत्नी की तिरछी नजर, इश्क का भूत, भीड़ का षड्यंत्र और नंबर प्लेट खोजने की जद्दोजहद—यह पूरा प्रसंग पति-पत्नी मनोविज्ञान पर एक बेहतरीन, हंसोड़ टिप्पणी है, जिसमें इश्क भी है, रश्क भी और भारतीय दांपत्य की शाश्वत नोकझोंक भी।”

मैं तेरी ही कब हो गई-कविता रचना

Vidya Dubey Dec 1, 2025 हिंदी कविता 2

“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”

व्यंग्य—कल, आज और कल : हिंदी व्यंग्य का व्यापक परिप्रेक्ष्य और बौद्धिक पुनर्स्थापन

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 29, 2025 Book Review 0

“विवेक रंजन श्रीवास्तव की ‘व्यंग्य—कल, आज और कल’ हिंदी व्यंग्य को एक गंभीर, बहुस्तरीय और विश्लेषणात्मक विधा के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक बताती है कि व्यंग्य केवल हँसी की सतह नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की गहरी परतों तक जाने वाली विचार-शक्ति है, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों को जोड़ती है।”

समोसे का सार्वभौमिक सत्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 29, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“समोसा सिर्फ नाश्ता नहीं—भारतीय समाज, राजनीति और प्रेमकथाओं का सबसे स्थायी त्रिकोण है। डॉक्टर से लेकर दफ़्तर और दाम्पत्य तक, हर मोड़ पर यह तला-भुना फल अपना प्रभाव दिखाता है। बर्गर रोए या बाबू सोए—पर समोसा आए तो सब जग जाएं! यही है समोसे का सार्वभौमिक सत्य।”

बेग़म अख़्तर : सुरों की मलिका

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 29, 2025 India Story 0

बेग़म अख़्तर—एक नाम जो सिर्फ़ संगीत नहीं, दर्द, रूह और नफ़ासत का दूसरा नाम है। फैज़ाबाद की एक हवेली से शुरू होकर लखनऊ की महफ़िलों तक पहुँची यह आवाज़ किसी उस्ताद की देन नहीं, बल्कि टूटे हुए बचपन और संघर्षों से पैदा हुई कशिश का चमत्कार थी। ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल को उन्होंने ऐसी आत्मा दी कि वे सिर्फ़ गाने न रहकर अनुभव बन गए। शादी के बाद संगीत छिन गया तो depression घेर लिया, पर जब उन्होंने फिर गाना शुरू किया—वे बेग़म अख़्तर बन गईं। उनकी ग़ज़लें आज भी वही हलचल जगाती हैं—जैसे कोई भूली हुई याद अचानक सांस ले उठे।