नेताजी का प्रार्थना पत्र-हे शंभो! शत्रु का विनाश करो!
जब राजनीति पूजा करने लगे और पूजा राजनीति करने लगे— तब शंभो भी सोच में पड़ जाते हैं।
India Ki Baat
जब राजनीति पूजा करने लगे और पूजा राजनीति करने लगे— तब शंभो भी सोच में पड़ जाते हैं।
अनुवाद शब्दों का यांत्रिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संप्रेषण है। यह वह पुल है, जिस पर चलते हुए हम एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं, बल्कि एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में प्रवेश करते हैं। अनुवादक शब्दों के पीछे छिपे समय, समाज और संवेदना को पढ़ता है—और उन्हें नए पाठक के हृदय में पुनर्जन्म देता है।
पराधीनता का प्रश्न—इतिहास का नहीं, मानसिकता का “भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से […]
व्यंग्य में नित नए व्यंग्यकार प्रसूत हो रहे हैं।कई चौकन्नी नज़रों से विसंगतियों को पकड़ रहे हैं तो कई उन्मीलित अवस्था में परिदृश्य को निहार रहे हैं।पिछले चंद वर्षों में सक्रिय हुए व्यंग्यकार मुकेश असीमित रोज कुछ न कुछ लिखकर फेसबुक पर बेहद सक्रिय हैं।उनके पास व्यंग्य दृष्टि भी है।”अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र” उनका […]
“आपने प्रशासन को जगाया है न? अब भुगतो। विकास की सुरसा अब खुले मुँह आपके नथुनों तक पहुँच चुकी है।”
फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!
“भद्रा में ‘आई लव यू’ न बोलें, केवल ‘हम्म’ प्राप्त होगा।” “शुक्र उच्च का हो तो गुलाब महँगा होगा।” “वचन लाभ में, आलिंगन अमृत में।” “ग्रह नहीं, बजट वक्री था।”
“मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि बन गया।” “जहाँ पीला, वहाँ हमारा।” बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत, पास से लोकतांत्रिक चेपा-आक्रमण। कालिदास ने कोयल लिखी, चेपों पर अभी शोध शेष है।
“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?” “विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक! क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है? अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?
शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।