नवराष्ट्रवाद : भावना की 5G स्पीड वाला देशप्रेम
“नवराष्ट्रवाद वह चूर्ण है जिसमें दो चुटकी डालते ही कोई भी बहस राष्ट्रभक्ति की आँच पर तवे की तरह लाल हो जाती है।” “आजकल सवाल पूछना विचार नहीं, ‘कौन भेजा तुम्हें’ परीक्षा का पहला प्रश्नपत्र बन गया है।”
India Ki Baat
“नवराष्ट्रवाद वह चूर्ण है जिसमें दो चुटकी डालते ही कोई भी बहस राष्ट्रभक्ति की आँच पर तवे की तरह लाल हो जाती है।” “आजकल सवाल पूछना विचार नहीं, ‘कौन भेजा तुम्हें’ परीक्षा का पहला प्रश्नपत्र बन गया है।”
दिव्यांग दिवस हमें याद दिलाता है कि मनुष्य का माप उसकी देह की सीमाओं से नहीं, उसके हृदय की ऊँचाई से होता है। जो अपूर्ण देह में भी पूर्ण आकाश लेकर चलते हैं—उनकी तेजस्विता, साहस और जीवन-संघर्ष समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं। यह दिवस हमें दया नहीं, सम्मान और समानता का संकल्प देता है।
अधूरी देह में भी पूरा आकाश बसता है—यह कविता जीवन की बाधाओं में छिपी अनंत संभावनाओं और साहस के उजाले को आवाज़ देती है।जब दुनिया सीमाएँ गिनाती है, तब हम अपने भीतर की उड़ान खोजते हैं। यह गीत प्रतिकूलताओं के बीच जिजीविषा का घोष है।
कला का ब्रह्मांड जहाँ खत्म होता है, समोसा वहीं से अपना दर्शन शुरू करता है—तीन कोनों में आत्मा, पदार्थ और ऊर्जा समाहित।” “यूरी मायस्को ने शायद संगमरमर देखने से पहले भारतीय कैंटीन का समोसा खाया होगा—नहीं तो ‘ट्रिनिटी’ इतनी भूख-भरी क्यों बनती?” “संगमरमर की मूर्ति प्रकाश पकड़ती है, और समोसा हमारे दिल… और पेट।” “अगर इस देश की असल त्रिमूर्ति कोई है, तो वह तेल, आलू और मैदा है—बाकी सब कलात्मक विस्तार हैं।”
“छोटे शहर के दर्शक की नजर से देखा जाए तो ‘जॉली LLB 3’ सिर्फ एक कोर्टरूम फिल्म नहीं—बल्कि कानून, संवेदना और किसान के संघर्ष का वह संगम है जो OTT की स्क्रीन को भी असली सिनेमा की गर्मी दे देता है।”
“व्यंग्य हँसाने की कला नहीं, हँसी के भीतर छुपी बेचैनी को जगाने की कला है। वह पल जब मुस्कान के बाद एक सेकंड की चुप्पी उतरती है—वही असली व्यंग्य है।” “व्यंग्यकार हर दृश्य को तिरछी आँख से देखता है—क्योंकि सीधी आँख से देखने पर आजकल सब कुछ सामान्य लगने लगा है, और यही सबसे असामान्य बात है।”
आज गीता जयंती है—वह दिन जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जन्मा कृष्ण का अमर संदेश मानवता को मार्ग दिखाता है। भय, दुविधा और मोह से जूझते अर्जुन को मिला यह उपदेश आज भी हर मनुष्य के भीतर के संघर्ष को दिशा देता है। गीता केवल ग्रंथ नहीं, जीवन का शाश्वत प्रकाश है।”
“डा. रामकुमार जोशी की यह व्यंग्यात्मक आत्मकथा सड़कों की भीड़ से ज्यादा वैवाहिक भीड़भाड़ की कहानी कहती है। सड़क पर दिखी ‘अज्ञात मोहतरमा’ ने एक क्षण को ड्राइविंग भी भुला दी और विवेक भी। पत्नी की तिरछी नजर, इश्क का भूत, भीड़ का षड्यंत्र और नंबर प्लेट खोजने की जद्दोजहद—यह पूरा प्रसंग पति-पत्नी मनोविज्ञान पर एक बेहतरीन, हंसोड़ टिप्पणी है, जिसमें इश्क भी है, रश्क भी और भारतीय दांपत्य की शाश्वत नोकझोंक भी।”
“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”
“विवेक रंजन श्रीवास्तव की ‘व्यंग्य—कल, आज और कल’ हिंदी व्यंग्य को एक गंभीर, बहुस्तरीय और विश्लेषणात्मक विधा के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक बताती है कि व्यंग्य केवल हँसी की सतह नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की गहरी परतों तक जाने वाली विचार-शक्ति है, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों को जोड़ती है।”