हक और हक़ीक़त के बीच खड़ी एक औरत

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 4, 2026 Cinema Review 0

यह फ़िल्म सिर्फ़ एक केस की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज, क़ानून, धर्म और स्त्री-अधिकार के बीच खड़े असहज सवालों को सामने रखती है। हक वह सिनेमा है जो परदे पर नहीं, दर्शक के भीतर बहस शुरू करता है।

“AI हर जगह है” — एक व्यंग्य

Wasim Alam Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है, इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है। AI जवाब दे रहा है— पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।

नाम में क्या रखा है?

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है। जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है। यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।

करें कोई भरें कोई

Ram Kumar Joshi Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 1

1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया। सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने। आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था। दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है। लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।

स्कारलेट और राधा : दो सभ्यताएँ, दो स्त्रियाँ, दो जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 30, 2025 Cinema Review 0

“स्कारलेट भूख से लड़ती है, राधा भूख को सहकर मूल्य बचाती है।” “एक स्त्री स्वयं को बचाने के लिए समाज से टकराती है, दूसरी समाज को बचाने के लिए स्वयं से।” “स्कारलेट की जिद निजी है, राधा की दृढ़ता सामूहिक।” “दोनों हारती नहीं हैं, पर जीत की उनकी परिभाषा अलग है।”

फ़ाइलों में दबे चेहरे और खोती मानवीयता : भूमिपुत्र पवनघुवारा 

Pawan Ghumara Dec 29, 2025 Blogs 0

“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।” “फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।” “लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”

राजेश खन्ना : सुपरस्टार से अकेलेपन तक — एक सितारे की पूरी कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 29, 2025 Cinema Review 0

राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार नहीं थे, वे उस दौर का नाम थे जब सिनेमा पूजा बन गया था। तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो आदमी शोर का आदी हो जाता है और खामोशी उसे डराने लगती है। जिसने एक बार शिखर को घर समझ लिया, वह ज़िंदगी भर मैदान को कमतर मानता रहा। काका की मुस्कान जितनी चमकदार थी, उनके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा।

थानेदार का वादा

Ram Kumar Joshi Dec 29, 2025 व्यंग रचनाएं 1

हर विदेशी—चाहे इंसान हो या बोतल—धीरे-धीरे अंदर तक मार करता है।” “शराब बदबू नहीं, गंध कहलाती है—यह सरकारी मान्यता प्राप्त पेय पदार्थ है।” “पुलिस थाने में संभ्रांत वर्ग की औकात बस इतनी ही होती है।” “आम आदमी की सेवार्थ—यह पंक्ति सिर्फ़ बोर्ड पर लिखी जाती है, दिल में नहीं।”

बीता साल: घटनाओं का नहीं, प्रतिक्रियाओं का इतिहास

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 27, 2025 India Story \बात अपने देश की 0

यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि अधूरी डायरी की तरह—जहाँ स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। घटनाएँ बदलीं, लेकिन उनसे ज़्यादा बदले हमारे डर, ग़ुस्सा और चुप्पियाँ। यह साल हमें किसी नतीजे तक नहीं लाया, बल्कि सवालों की लंबी सूची सौंप गया—कि हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं और कब चुप रहते हैं। आतंक, युद्ध, आस्था, कॉमेडी, सोशल मीडिया—हर मोर्चे पर यह साल हमें भीतर तक झकझोरता रहा। इतिहास बनता रहा, और हम बदलते रहे।

सांता क्लॉज को एक चिट्ठी

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 24, 2025 Culture 0

यह व्यंग्यात्मक चिट्ठी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की उन इच्छाओं का दस्तावेज़ है, जो सरकारों, बैंकों और व्यवस्थाओं से निराश होकर सीधे सांता क्लॉज़ तक पहुँचती हैं। मोज़ों से लेकर स्विस अकाउंट, बिजली बिल से लेकर बॉस की मीटिंग तक—यह रचना हास्य, विडंबना और करुणा के बीच झूलती एक सच्ची सामाजिक तस्वीर पेश करती है।