डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
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बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी।
नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम।
‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं।
समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
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यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
Prem Chand Dwitiya
Jan 20, 2026
व्यंग रचनाएं
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“कुत्ते पाल लो, मुगालते पाल लो—
लेकिन सफेद हाथी मत पालो,
उसके दाँत अच्छे-अच्छों को पसीना ला देते हैं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।”
“किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।”
“इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।”
“कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 14, 2026
व्यंग रचनाएं
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मरना तय था, यह हम मान चुके थे—
पर किस तत्व से मरना है, यह विकल्प भी अस्पताल तय करेगा,
यह हमें बताया नहीं गया।
पहले आग, अब पानी…
लगता है अस्पताल पंचतत्व को
सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
व्यंग रचनाएं
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दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी।
एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन—
न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
Ram Kumar Joshi
Jan 9, 2026
व्यंग रचनाएं
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मेरा बाप घर में मर गया,
पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है।
बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं—
यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।
Prem Chand Dwitiya
Jan 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया।
जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है।
यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।
Wasim Alam
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है,
इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है।
AI जवाब दे रहा है—
पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है।
जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है।
यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।