Dr Shailesh Shukla
Mar 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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सरकारी व्यवस्था की सुस्त गति में यदि कोई शक्ति अचानक फाइलों को पंख लगाकर उड़ाती दिखाई देती है, तो वह है भ्रष्टाचार। यह व्यंग्य लेख बताता है कि कैसे रिश्वत की अनौपचारिक व्यवस्था आम नागरिक, अधिकारी और ठेकेदार—सभी के लिए “सुविधाजनक तंत्र” बन चुकी है।
Dinesh Gangarde
Mar 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब नौकरी विदा लेती है तो जीवन में एक नई नायिका प्रवेश करती है—पेंशन। यह ऐसी प्रेमिका है जो हर महीने समय पर आती है, मूड नहीं बदलती और बुढ़ापे में आत्मसम्मान और सुकून का सहारा बन जाती है। हास्य-व्यंग्य के अंदाज़ में पेंशन की इसी “वफादार महबूबा” पर यह रोचक लेख।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 25, 2026
व्यंग रचनाएं
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“हम इसे चोरी मानते ही नहीं। हम सीना ठोककर कहते हैं—यह हमारा मौलिक अधिकार है। हमने तो छह दिखाया था, आपने नौ समझ लिया तो यह आपकी दृष्टि-दोष है।”
“हम विचारों की खेती कम और प्रतिलिपियों की फसल अधिक उगाते हैं।”
Prem Chand Dwitiya
Feb 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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कभी पटिए पर बैठकर शहर की राजनीति, समाज और संस्कार तय होते थे; अब वही चर्चाएँ व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर सिमट गई हैं। पटिया संस्कृति का यह पटाक्षेप समय की विडंबना है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।
Pradeep Audichya
Feb 22, 2026
व्यंग रचनाएं
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राजमहल जैसे वैभव के बीच, असली युद्ध तंदूर पर था—एक रोटी की तलाश में खड़े आधुनिक अर्जुन।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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लोकतंत्र की डाल पर हम खड़े नहीं हैं,
अपनी-अपनी पूँछ से लटके हुए हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब राजनीति पूजा करने लगे
और पूजा राजनीति करने लगे—
तब शंभो भी सोच में पड़ जाते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!