होमबाउंड: ऑस्कर की जुगाली, लॉकडाउन की धूल और सच्चाई का सिनेमा–संग्राम

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 23, 2025 Cinema Review 0

“होमबाउंड एक ऐसी फ़िल्म है जो दो दोस्तों की लॉकडाउन यात्रा के बहाने भारतीय समाज की गहरी परतों—जाति, धर्म, बेरोज़गारी और व्यवस्था—को छूती है। बेहतरीन अभिनय के बावजूद फिल्म कई जगह ऑस्कर-फ्रेंडली एजेंडा और सजावटी दुखों में उलझती दिखती है। पढ़िए एक ईमानदार, रोचक और व्यंग्यात्मक समीक्षा।”

महाभारत: भारत की सबसे पुरानी मैनेजमेंट हैंडबुक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 23, 2025 India Story 0

महाभारत सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि मानव-व्यवहार, नेतृत्व, रणनीति, कॉन्ट्रेक्ट-मैनेजमेंट, समय-निर्णय और टीम-डायनैमिक्स की सबसे पुरानी केस-स्टडी है। अर्जुन की जिज्ञासा, दुर्योधन का एटिट्यूड, युधिष्ठिर की गलतियाँ और कृष्ण की नेतृत्व-शैली, आज के किसी भी कॉर्पोरेट संगठन पर समान रूप से लागू होती हैं। महाभारत हमें सिखाती है कि प्रश्न पूछना बुद्धिमत्ता है, सही गेम चुनना स्ट्रेटेजी है, समय पर निर्णय लेना दक्षता है, और नेतृत्व का असली रूप प्रतिष्ठा नहीं, ज़मीन पर उतरकर सारथी बनना है।

व्यंग्य का वैश्विक और हिंदी साहित्यिक परिप्रेक्ष्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 22, 2025 आलोचना ,समीक्षा 0

पश्चिमी साहित्य में ऑस्टेन, स्विफ्ट, ऑरवेल और हक्सले जिस तीक्ष्ण हास्य से समाज और सत्ता की विसंगतियों को खोलते हैं, वहीं हिंदी में परसाई, शरद जोशी और चतुर्वेदी उसी परंपरा को देसी अंदाज़ में आगे बढ़ाते हैं। व्यंग्य भाषा नहीं देखता—वह मनुष्य की आदतों, पाखंड, लालच, दिखावे और सामाजिक मूर्खताओं पर चोट करता है। यही कारण है कि व्यंग्य वैश्विक भी है और गहरे स्थानीय भी।

गीता, धर्म और सफलता: स्वधर्म से करियर मैनेजमेंट तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 22, 2025 Lifestyle 0

श्रीमद्भगवद्गीता का पहला शब्द है “धर्म” और अंतिम “मम” – यानी पूरी कथा इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है कि “मेरा धर्म क्या है?” धर्म यहाँ मजहब नहीं, हमारे मूल गुण, स्वभाव और जिम्मेदारी का नाम है। जब हम भीड़ और ट्रेंड के पीछे भागकर अपना स्वधर्म छोड़ देते हैं, तब बाहर से सफल दिखकर भी भीतर से खाली रह जाते हैं। गीता हमें सिखाती है कि कर्म पर अधिकार रखो, फल को प्रसाद मानो, अपने स्वभाव के अनुरूप काम करो और आज के आनंदित कर्म में ही सच्ची “सफलता” खोजो।

पूँजीवाद की टंकी से फ्लश करता बाजार 

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 21, 2025 व्यंग रचनाएं 0

पूँजीवाद आज हमारे जीवन का रिमोट कंट्रोल बन चुका है। वह तय करता है कि हमें क्या खरीदना है, क्या छोड़ना है और किस चीज़ में ‘स्मार्ट चॉइस’ बनने का भ्रम पैदा करना है। बाजार अब सिर्फ चीजें नहीं बेचता, हमारी कमजोरियाँ, असुरक्षाएँ और आदतें भी खरीद लेता है। हर फ्लश, हर swipe, हर click के पीछे एक पूरा तंत्र सक्रिय है—जो हमें उपभोक्ता से ज्यादा उपलब्ध दिमाग मानता है। इस व्यंग्य में दिखाया गया है कि कैसे एक विशाल टंकी की तरह पूँजीवाद ऊपर बैठा है, और नीचे पूरा समाज उसकी एक हल्की-सी फ्लश से बहने लगता है।

जनजातीय समुदायों का पारम्परिक पर्यावरण विज्ञान : प्रकृति के साथ सह-जीवन की विराट गाथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 21, 2025 Culture 0

भारत के जनजातीय समुदायों का पारम्परिक पर्यावरण विज्ञान प्रकृति के साथ उनके जीवित, गहरे और सर्जनात्मक संबंध को व्यक्त करता है। मौसम, जंगल, जल, बीज और पशु-पक्षियों के व्यवहार को पढ़ने की उनकी क्षमता अद्भुत है। उनका ज्ञान तकनीक नहीं—अनुभव, आध्यात्मिकता और सामुदायिक विवेक का परिणाम है। आज IPCC और UNESCO इसे जलवायु अनुकूलन और सतत भविष्य का वैश्विक स्तम्भ मानते हैं।

परम्परागत ज्ञान की अवधारणा : एक गहन और रोचक विश्लेषण

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 20, 2025 शोध लेख 0

परम्परागत पर्यावरणीय ज्ञान प्रकृति से मनुष्य के सदियों पुराने संबंध का जीवित दस्तावेज़ है। यह अनुभव, अवलोकन, अनुकूलन, सामुदायिक जिम्मेदारी और आध्यात्मिक संवेदना पर आधारित ज्ञान प्रणाली है, जो प्रकृति को एक जीवित, समग्र तंत्र मानती है। आधुनिक विज्ञान जहाँ प्रयोगशाला में समाधान खोजता है, वहीं यह ज्ञान स्थानीय संसाधनों, सामुदायिक विवेक और सांस्कृतिक नैतिकता से टिकाऊ भविष्य का मार्ग प्रस्तुत करता है।

वेदों और उपनिषदों में पर्यावरण : प्राचीन भारत का पारिस्थितिक दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 19, 2025 Blogs 0

This essay explores the profound ecological wisdom embedded in the Vedas and Upanishads, where nature is revered as a living, conscious entity. Ancient Indian seers envisioned Earth as mother, water as life, air as prana, and the entire cosmos as divinely interconnected. Their philosophy of restraint, gratitude, and ecological balance offers timeless guidance for today’s environmental crises, revealing a sustainable vision rooted in spiritual harmony.

भगवान परीक्षा ले रहा है-हास्य व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 17, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भगवान के पास और कोई काम नहीं? हर परेशानी पर लोग इतना ही कहते हैं—धैर्य रखो, भगवान परीक्षा ले रहे हैं…मानो ऊपर कोई परीक्षा बोर्ड बैठा हो, और हम सब उसके आजीवन परीक्षार्थी हों।” 2. “हर आदमी का प्रश्नपत्र अलग—न टाइम टेबल, न सिलेबस, न नोटिस। बस सुबह उठो और पता चले—भगवान ने आज पॉप क्विज रख दी है!” 3. “पड़ोसी, रिश्तेदार, सलाहवीर—सबको लगता है भगवान ने सवाल-पत्र इन्हीं से पूछा है। खुद के पेपर तकिये के नीचे छुपाएँगे, पर दूसरों की कॉपी में झाँकना नहीं छोड़ेंगे!”

“सरदार @150 यूनिटी मार्च : युवा कदमों से गूँजता एक भारत, आत्मनिर्भर भारत”

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 16, 2025 News and Events 0

“कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक 779 जिलों में एक साथ उठते कदम, सरदार पटेल के सपने को फिर से जीवंत करेंगे—यह पदयात्रा सिर्फ दूरी नहीं, दिलों को जोड़ने की यात्रा है।” “करमसद से एकता नगर तक 152 किलोमीटर की राष्ट्रीय पद यात्रा उन युवाओं के संकल्प की कहानी होगी, जो खादी पहनकर एकता, आत्मनिर्भरता और सेवा के मूल्यों को अपने जीवन में उतारने निकले हैं।” “सरदार @150 यूनिटी मार्च सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी का खुला निमंत्रण है—जहाँ हर कदम ‘एक भारत, आत्मनिर्भर भारत’ का नारा बनकर गूँजेगा।”