वेदों और उपनिषदों में पर्यावरण : प्राचीन भारत का पारिस्थितिक दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 19, 2025 Blogs 0

This essay explores the profound ecological wisdom embedded in the Vedas and Upanishads, where nature is revered as a living, conscious entity. Ancient Indian seers envisioned Earth as mother, water as life, air as prana, and the entire cosmos as divinely interconnected. Their philosophy of restraint, gratitude, and ecological balance offers timeless guidance for today’s environmental crises, revealing a sustainable vision rooted in spiritual harmony.

भगवान परीक्षा ले रहा है-हास्य व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 17, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भगवान के पास और कोई काम नहीं? हर परेशानी पर लोग इतना ही कहते हैं—धैर्य रखो, भगवान परीक्षा ले रहे हैं…मानो ऊपर कोई परीक्षा बोर्ड बैठा हो, और हम सब उसके आजीवन परीक्षार्थी हों।” 2. “हर आदमी का प्रश्नपत्र अलग—न टाइम टेबल, न सिलेबस, न नोटिस। बस सुबह उठो और पता चले—भगवान ने आज पॉप क्विज रख दी है!” 3. “पड़ोसी, रिश्तेदार, सलाहवीर—सबको लगता है भगवान ने सवाल-पत्र इन्हीं से पूछा है। खुद के पेपर तकिये के नीचे छुपाएँगे, पर दूसरों की कॉपी में झाँकना नहीं छोड़ेंगे!”

“सरदार @150 यूनिटी मार्च : युवा कदमों से गूँजता एक भारत, आत्मनिर्भर भारत”

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 16, 2025 News and Events 0

“कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कोहिमा तक 779 जिलों में एक साथ उठते कदम, सरदार पटेल के सपने को फिर से जीवंत करेंगे—यह पदयात्रा सिर्फ दूरी नहीं, दिलों को जोड़ने की यात्रा है।” “करमसद से एकता नगर तक 152 किलोमीटर की राष्ट्रीय पद यात्रा उन युवाओं के संकल्प की कहानी होगी, जो खादी पहनकर एकता, आत्मनिर्भरता और सेवा के मूल्यों को अपने जीवन में उतारने निकले हैं।” “सरदार @150 यूनिटी मार्च सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि युवाओं के लिए राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी का खुला निमंत्रण है—जहाँ हर कदम ‘एक भारत, आत्मनिर्भर भारत’ का नारा बनकर गूँजेगा।”

ट्रकों का दर्शनशास्त्र: सड़क का पहलवान और प्रेम का दार्शनिक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 12, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“The truck isn’t just metal — it’s a moving philosophy, painted with poetry and powered by diesel.” “Between the roar of the engine and the rhythm of the horn lies India’s true symphony.” “Yes, my friend — the truck is the real father of the road.”

आत्मबोध से विश्वबोध तक — चेतना की वह यात्रा जो मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ बनाती है

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 11, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

“मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा कोई भौगोलिक नहीं होती — वह भीतर जाती है। आत्मबोध से विश्वबोध तक की यह यात्रा ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की प्रक्रिया है — जहाँ व्यक्ति स्वयं को जानकर समस्त सृष्टि से एकात्म हो जाता है। जब ‘स्व’ का दीप जलता है, तब ‘सर्व’ का सूरज उगता है — यही चेतना की परिपूर्णता है।”

स्वाभिमान का स्वर: 150 वर्ष वंदे मातरम्

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 11, 2025 Important days 0

“वंदे मातरम् केवल दो शब्द नहीं, एक दीर्घ श्वास है जो इस उपमहाद्वीप की नसों में आज भी बहती है। डेढ़ सदी बाद भी यह गीत हमें याद दिलाता है कि भारत केवल भौगोलिक रेखाओं का जोड़ नहीं, एक जीवित अनुभूति है। यह गीत राजनीति से ऊपर उठकर नागरिक-धर्म का गान है — एक ऐसा धर्म जो मनुष्यता को श्रेष्ठ मानता है, और मातृभूमि को ‘भूमि’ से ‘मां’ बना देता है।”

मुद्दों की चुहिया – पिंजरे से संसद तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।

कंजूस मक्खीचूस-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 10, 2025 व्यंग रचनाएं 0

कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं—क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। उनका आदर्श वाक्य है — “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” ... जहाँ नेता प्रचार से मशहूर होते हैं, वहाँ कंजूस बिना खर्च के ही चर्चा में रहते हैं। मोहल्ले की चाय की थड़ियों पर उनके नाम के किस्से चलते हैं। ... कहते हैं, ये लोग लंबी उम्र जीते हैं — शायद इसलिए कि ज़िंदगी भी बहुत संभालकर खर्च करते हैं।

चढ़ावा-प्लाज़ा: जहाँ देवता भी टोल टैक्स लेते हैं

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 5, 2025 व्यंग रचनाएं 0

सड़कों पर “देवता-तोल” का नया युग — जहाँ खतरनाक मोड़ और पुल नहीं, बल्कि चढ़ावे की रसीदें आपकी जान बचाती (या बिगाड़ती) हैं। सरकार टेंडर दे, देवता ठेका ले — वाह री व्यावसायिक भक्ति!