डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
समसामयिकी
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“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।”
“जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।”
“हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।”
“इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 10, 2026
Poems
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यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर
दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है—
क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है
या रोज़ की साँस?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 7, 2026
Cinema Review
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यह लेख फिल्म स्वामी को कथानक, अभिनय या संगीत से आगे ले जाकर एक सामाजिक विमर्श के रूप में देखता है—जहाँ स्त्री-स्वतंत्रता, विवाह और निर्णय-स्वातंत्र्य टकराते हैं। यह समीक्षा उस अनुभव की तरह है, जो फिल्म देखने के बाद मन में चलता रहता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
संस्मरण
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बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है।
जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है।
यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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प्रकृति के पास भी भाषा है—संकेतों, ध्वनियों और स्पर्श की।
लेकिन मनुष्य की भाषा उसे केवल बोलने की नहीं, अनुभव को सहेजने, तर्क रचने और सभ्यता बनाने की शक्ति देती है।
यह लेख भाषा को शब्द ब्रह्म, स्मृति, तर्क, न्याय और राज्य की जड़ के रूप में समझने का एक विचारोत्तेजक प्रयास है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
Darshan Shastra Philosophy
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नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है।
प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ?
यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 5, 2026
हास्य रचनाएं
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बचपन में लाइट जाना उत्सव था—कहानियाँ, तारे और परिवार।
आज लाइट जाए या ग्रिड फेल हो—ज़िंदगी स्क्रीन के सहारे चलती है।
यह कार्टून उसी बदलाव पर एक हल्का, चुभता और मुस्कराता व्यंग्य है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 4, 2026
Cinema Review
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अचानक मिला पैसा क्या सच में वरदान होता है, या वह इंसान की नैतिक नींव को भी हिला देता है?
छप्पर फाड़ के एक ऐसी फ़िल्म है, जो हँसाते-हँसाते आपको अपने भीतर झाँकने पर मजबूर कर देती है—बिना उपदेश दिए, सिर्फ़ सवाल छोड़कर।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 4, 2026
Cinema Review
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यह फ़िल्म सिर्फ़ एक केस की कहानी नहीं कहती, बल्कि समाज, क़ानून, धर्म और स्त्री-अधिकार के बीच खड़े असहज सवालों को सामने रखती है। हक वह सिनेमा है जो परदे पर नहीं, दर्शक के भीतर बहस शुरू करता है।