बीमार आदमी के समाचार लेने का विचार
बुखार उन्हें आया है, लेकिन तैयारी मेरी चल रही है—चेहरे पर कितनी चिंता रखूँ, थैले में कौन-से फल और बातचीत में कौन-से किस्से? बीमार का हाल पूछने की सामाजिक औपचारिकताओं पर एक आत्मव्यंग्य।
India Ki Baat
बुखार उन्हें आया है, लेकिन तैयारी मेरी चल रही है—चेहरे पर कितनी चिंता रखूँ, थैले में कौन-से फल और बातचीत में कौन-से किस्से? बीमार का हाल पूछने की सामाजिक औपचारिकताओं पर एक आत्मव्यंग्य।
व्यंग्य लिखते-लिखते जब लेखक को लगे कि अब इस विधा को और नुकसान पहुँचाना संभव नहीं, तो अगला स्वाभाविक कदम क्या हो? शायद व्यंग्य-विमर्श! साहित्यिक संगोष्ठियों, भारी-भरकम शब्दावली, चाय-समोसे, परस्पर महिमामंडन और “व्यंग्य संकट में है” जैसे सदाबहार विषयों पर एक चुटीला आत्मव्यंग्य।
जवान दिल की भी गारंटी नहीं होतीमैं जब किसी तीस-पैंतीस वर्ष के युवक को यह कहते सुनता हूँ कि “डॉक्टर साहब, मेरी उम्र ही क्या है, मुझे हार्ट की बीमारी कैसे हो सकती है?”, तो मुझे सबसे पहले यही लगता है कि हमारी सबसे बड़ी समस्या बीमारी नहीं, यह भरोसा है कि बीमारी अभी दूर […]
क्या गर्दन का दर्द कंधे या हाथ तक जाता है अथवा उँगलियों में झनझनाहट होती है? जानिए Cervical Spondylosis के लक्षण, सही posture, सुरक्षित neck exercises और वे warning signs जिनमें तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
ऑनलाइन रिश्तों में बधाई देना, न्यौता भेजना और अपनापन जताना कितना आसान हो गया है! लेकिन जब कोई मित्र सचमुच दरवाज़े पर आ जाए, तो क्या होता है? डिजिटल दोस्ती की सुविधाओं पर एक चुटीला आत्मव्यंग्य।
आम आदमी आखिर वहम के बिना जिए भी तो कैसे? चुनावी वादों से लेकर महँगाई, ईएमआई, बजट, सोशल मीडिया और घरेलू जिंदगी तक—यह हास्य-व्यंग्य हमारे रोजमर्रा के भ्रमों, उम्मीदों और आत्मसंतोष पर चुटीला कटाक्ष है।
धर्म के नाम पर कानफोड़ू डीजे, पंडालों में फूहड़ मनोरंजन, पीछे जुए की बाजी, दबाव का चंदा, रास्ता रोकते जुलूस और कैमरों के सामने धर्म-सेवा—आखिर आस्था कहाँ खत्म होती है और प्रदर्शन कहाँ शुरू होता है? पढ़िए धार्मिक पाखंड और दिखावे पर तीखा व्यंग्य “धर्म में गिरने के नए कीर्तिमान”।
गिरना अब दुर्घटना नहीं, बाकायदा एक कौशल है। पत्रकारिता में टीआरपी, राजनीति में अवसर, धर्म में प्रदर्शन और साहित्य में सम्मान—हर क्षेत्र में गिरावट के नए रास्ते खुल चुके हैं। सवाल सिर्फ इतना है—अगर गिरना ही है, तो आखिर किस क्षेत्र में गिरें?
“काहे अड़ि रही गौरा” एक भावपूर्ण शिव–गौरा विवाह गीत है, जिसमें माता मैना को भस्मधारी औघड़ जोगी दिखाई देते हैं, जबकि गौरा को उन्हीं में संपूर्ण ब्रह्म के दर्शन होते हैं। यह लोकभजन शिव–पार्वती के अलौकिक प्रेम, गौरा की तपस्या और अटूट समर्पण की सुंदर कथा प्रस्तुत करता है।
पद छोटा हो या बड़ा, उसकी अपनी अलग माया है। कोई पद पाकर रुतबा बनाता है, कोई पद के लिए संगठन तोड़ता है, तो कोई चरण पकड़कर पद हासिल करता है। ‘पद’ की इसी सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक महिमा पर रोचक व्यंग्य—“पद पाकर, नामी बनने वालों की सुनामी!”