सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
“मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि बन गया।” “जहाँ पीला, वहाँ हमारा।” बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत, पास से लोकतांत्रिक चेपा-आक्रमण। कालिदास ने कोयल लिखी, चेपों पर अभी शोध शेष है।
India Ki Baat
“मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि बन गया।” “जहाँ पीला, वहाँ हमारा।” बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत, पास से लोकतांत्रिक चेपा-आक्रमण। कालिदास ने कोयल लिखी, चेपों पर अभी शोध शेष है।
“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?” “विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक! क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है? अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?
शिव केवल देवता नहीं, एक आंतरिक अवस्था हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त के पार जो शुद्ध प्रेम बचता है, वही शिवत्व है। शिव चतुर्दशी पर पढ़ें — शिव के वास्तविक अर्थ, निराकार-साकार स्वरूप और आत्मसाधना पर एक गहन विचार।
गंगापुर सिटी के वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जन, लेखक और समाजसेवी डॉ. मुकेश चंद गर्ग ने बॉक्स एफएम पर अपनी 25 वर्षों की चिकित्सा यात्रा, साहित्यिक लेखन, आधुनिक ऑर्थोपेडिक तकनीकों और समाज सेवा के अनुभव साझा किए। यह प्रेरणादायक संवाद चिकित्सा और मानवीय मूल्यों के सुंदर संतुलन को उजागर करता है।
“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है। यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है, पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।” आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं, बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है। मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो, पर्यावरण के लिए सम्मेलन, राजनीति के लिए भावनात्मक नारे— ये सब प्लेसीबो हैं। जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है, तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।
यह कविता आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ से उपजी थकान, आंतरिक रिक्तता और आत्मचिंतन की आवश्यकता को कोमल लेकिन गहरे दार्शनिक स्वर में व्यक्त करती है। यश, धन और शक्ति की आकांक्षाओं से मुक्त होकर शांति, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक सौभाग्य बताया गया है। मीरा, राम और वैराग्य के प्रतीकों के माध्यम से यह रचना विकास और शांति के संतुलन पर प्रश्न उठाती है और पाठक को ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है।
यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।
यह लेख व्यक्तिगत वित्त की बुनियादी लेकिन ज़रूरी समझ को सरल हिंदी में प्रस्तुत करता है। इसमें वर्तमान आर्थिक स्थिति को समझने से लेकर कर्ज़ प्रबंधन, लक्ष्य निर्धारण, निवेश रणनीति, कार और घर जैसे बड़े फैसलों तक—हर विषय को व्यवहारिक उदाहरणों के साथ समझाया गया है। यह लेख उन सभी के लिए है जो पैसे को तनाव नहीं, साधन बनाना चाहते हैं।
गोयल डेंटल क्लिनिक में डॉ. हिमांशु गोयल द्वारा 1 फरवरी से 31 मार्च 2026 तक संचालित निःशुल्क दंत चिकित्सा शिविर के अंतर्गत लायंस क्लब सार्थक परिवार के लिए विशेष शिविर आयोजित किया गया, जिसमें आधुनिक तकनीक से दंत परीक्षण, स्केलिंग एवं डिजिटल एक्स-रे की सुविधाएँ प्रदान की गईं।